Wednesday, July 14, 2010
मोहम्मद रफ़ी की याद में
जुलाई का महीना मेरे लिये एक टीस लेकर आता है । इस महीने की वो मनहूस आखिरी तारीख मुझे खूब याद है, अलबत्ता सन भूल चुका हूँ । शायद ही किसी पारिवारिक अन्तरंग, यहाँ तक कि अपने अभिन्न बालसखा आर.एन. राय की मृत्यु पर भी मेरी आँखों से ऐसी अविरल आँसुओं की धारा बही हो, मुझे याद नहीं । वह रेडियो का ज़माना था, जब मैने सुना कि, मोहम्मद रफ़ी साहब अपने करोड़ों चहेतों को मर्माहत कर दुनिया से रुख्सत हो चुके हैं । किसी को अज़ीब न लगे, इसलिये थोड़ा एकान्त में भाग गया और जी भर कर रोया । पता नहीं किन भावनाओं के तहत अपने अन्दर कई दिनों तक एक खालीपन का एहसास होता रहा, जबकि मैने उन्हें रूबरू कभी नहीं देखा । देखने और मिलने का कोई ज़रिया भी नहीं था । उस दौर में मुम्बई (तब की बम्बई) पहुंचना, और पहुंच कर भी उनसे मिल पाना, अपने वश की बात ही नहीं थी । बस ज़माने की तरह मैं भी उनकी आवाज़ पर दिलोजान से फ़िदा था, और आज भी हूँ । उनकी महान शख्सियत के क़िस्से फ़िल्मी पत्रिकाओं और अखबार के ज़रिये ही जान पाता था । यह कि रफ़ी साहब की आवाज़ में जितना जादू है, उनका व्यक्तित्व और चरित्र भी उससे कम जादुई और महान नहीं है । किसी समय यह भी पता लगा कि, रफ़ी साहब ने सिने-जगत को लाभ पहुंचाने के लिये अपने व्यक्तिगत आर्थिक लाभ का भी त्याग करने से गुरेज़ नहीं किया, जिसपर स्वर-कोकिला लता जी से उनकी ठन गई थी । लता जी को रफ़ी साहब की सहमति के कारण होने वाले गायकों के नुकसान पर आपत्ति थी, जिसके कारण काफ़ी लम्बे समय तक किसी गाने में उन्होंने रफ़ी साहब के साथ आवाज़ देने से अपने को अलग रखा । मैं जब नौवीं कक्षा में था, उसी समय अपने क्लास में पढ़ने वाले आर.एन. राय से मेरी मित्रता हुई, जिसकी बुनियाद के पीछे भी रफ़ी साहब की आवाज़ ही थी । हम दोनों ही रफ़ी के गानों के दीवाने थे, और मन में हसरत ही रह गई कि दोनों इकट्ठे कभी उनसे ज़रूर मिलेंगे । स्कूल के टिफ़िन के समय हम दोनों ज़रा अलग जाकर बैठते और शुरू हो जाती मोहम्मद रफ़ी के गीतों की चर्चा । फ़िर सम्मिलित सुर में उनके गानों को दोनो मित्र गाते और आनन्द के सागर में डुबकियां लगाते —‘दूर रह कर ना करो बात क़रीब आ जाओ’, ‘मेरा तो जो भी क़दम है वो तेरी राह में है’, ‘याद न जाए बीते दिनों की’, ‘जब जब बहार आई’, ‘अकेले हैं चले आओ’, ‘ये आँसू मेरे दिल की ज़ुबान हैं’, ‘ना झटको ज़ुल्फ़ से पानी’, ‘दिन ढल जाए हाए’, ‘ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए’, ‘तेरी ज़ुल्फ़ों से’ और ‘ओ दुनिया के रखवाले’ जैसे जो भी गीत ज़ुबान पर आ जाते, आधे-अधूरे ही सही, उसी में खो जाते । हमारी इस दीवानगी से सभी परिचित थे । मेरे मित्र को रफ़ी की आवाज़ की तुलना किसी और समकालीन गायक से किया जाना भी सख्त नापसन्द था । कुछ लड़के जानबूझ कर चिढ़ाने के लिये उसे छेड़ते और स्व. किशोर कुमार की आवाज़ की तारीफ़ उसके सामने करते । मेरा मित्र झगड़े पर उतारू हो जाता और कहता, “अपने फ़टे बाँस जैसी आवाज़ वाले गायक के गानों की ज़्यादा तारीफ़ न करो ।” हालांकि स्व. किशोर कुमार के कुछ गाने, मसलन ‘कोई हमदम न रहा’, ‘ज़िन्दगी का सफ़र’ और ‘देखा है ज़िन्दगी को’ जैसे गीत मेरे मित्र को भी काफ़ी पसंद थे । रफ़ी साहब के इन्तक़ाल के तीन चार दिन बाद मेरी मुलाक़ात अपने मित्र से हो पायी, और मिलते ही उसकी आँखें डबडबा गई थीं, मुझे अच्छी तरह याद है । फ़िर हम गमगीन से टहलते हुए अपने छोटे से रेलवे स्टेशन के फ़ुटब्रिज के ऊपरी कोने में जा बैठे और बेसाख्ता शुरू हो गए – ‘तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे…जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे…संग संग तुम भी गुनगुनाओगे’ । इसके बाद—‘दिल का सूना साज़ तराना ढूंढेगा…तीरे निगाहे नाज़ निशाना ढूंढेगा…अरे मुझको मेरे बाद ज़माना ढूंढेगाऽऽऽ ।’ और भी बहुत सारे गीत हमने गाए, फ़ूट-फ़ूट कर रोए, तब जाकर जी थोड़ा हल्का हुआ । आगे हमने उम्र की तमाम दहलीज़ें पार कीं, शादीशुदा हुए, बाल-बच्चेदार हुए, परन्तु रफ़ी साहब की आवाज़ के प्रति हमारी दीवानगी में कभी कोई कमी नहीं आई । दुनियादारी के प्रति समस्त जवाबदेही का निर्वहन करते हुए भी, हम अपने ज़ाती सुकून के लिये फ़ुर्सत निकाल ही लेते थे । एक-दूसरे की ससुराल भी साथ-साथ जाते और राजदूत मोटरसाइकिल पर चलते हुए भी—‘रुकती नहीं है नज़ारों पे नज़र…आहा आहा आ ये सुहाना सफ़र’ और—‘छेड़ मेरे हमराही…गीत कोई ऐसा…उम्र भर हम जिसे गुनगुनाते रहें’ आदि गाते हुए गन्तव्य तक पहुंचते । फ़िर एक दिन भरी जवानी में ही मेरा यार मुझे छोड़ कर चला गया । पता नहीं उस उम्र में ही उसे कब हृदय-रोग ने अपने आगोश में ले लिया था, जिसे काफ़ी दिनों तक उसने मुझसे और अपने परिवार, दोनो से छुपा कर रखा था । वेल्लोर में ओपेन-हार्ट सर्जरी हुई, सफ़ल भी रही, लेकिन मेरा दोस्त छ: माह से अधिक नहीं चल पाया । मेरे लिये यह झटका रफ़ी साहब की मौत से कहीं बड़ा था, परन्तु आज़ तक नहीं समझ पाया कि, क्यों नहीं मेरी आँखों से उतने आँसू निकले, जितना रफ़ी साहब की मौत पर मैं ज़ार-ज़ार रोया था । जबकि मेरा मित्र मेरा हमप्याला, हमनिवाला, हमसफ़र और हमराज़ सबकुछ था । हम दोनो की पत्नियों और परिवार द्वारा भी हमारी अभिन्नता को पूरी मान्यता प्राप्त थी । दोनो परिवारों की नज़र में हमारी दोस्ती कुदरत के किसी अज़ूबे से कम नहीं थी । उसकी मृत्यु के बाद स्थिति यह थी कि मेरे मित्र की पत्नी मुझे देखते ही विचलित हो जाती । उसे लगता कि बस मेरे पीछे ही वह भी आ रहा होगा । फ़िर विक्षिप्त सी बिलखने लगती –“नाऽऽ, ऊ आरो आसिबे ना…चोले गेलो…चोले गेलो” अर्थात ना, वो अब और नहीं आने वाला…चला गया…चला गया (मेरा मित्र बंगाली परिवार से था) । काफ़ी दिनों बाद तक भी, उसके यहां मेरी मौज़ूदगी के समय संयोगवश टी.वी. पर चित्रहार आदि कार्यक्रम में अगर मोहम्मद रफ़ी का कोई गीत आ जाता, तो उसकी बीवी फ़फ़क पड़ती । बच्चे दौड़ कर टी.वी. बन्द कर देते । बोड़ो दा (मित्र के बड़े भाई साहब) ने बताया कि तुम दोनों (मैं और मेरा स्वर्गीय दोस्त) रफ़ी के जो ढेर सारे कैसेट्स लेकर कमरे में पड़े रहते थे, उन्हें हटा देना पड़ा । मेरे मित्र के जाने के बाद भी रफ़ी साहब के प्रति मेरा अनुराग पूर्ववत है, परन्तु अब अक्सर उनके उस गाने की आवाज़ मेरे ज़ेहन में गूँजती रहती है –‘ओ दूर के मुसाफ़िर…हमको भी साथ लेले रे…हमको भी साथ ले ले…हम रह गए अकेले’ । सोचता हूँ, शायद हज़ारों साल में कहीं एक बार मेरे स्व. दोस्त और मरहूम मोहम्मद रफ़ी साहब जैसी शख्सियतें इस धरती पर आती हैं । आज कम से कम वो दोनों एक ही जहाँ के बाशिन्दे तो हैं ! अकेलापन तो सिर्फ़ और सिर्फ़ मुझपर तारी है… “जाने वाले कभी नहीं आते…जाने वाले की याद आती है”……
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